रविवार, 23 जनवरी 2011

नालंदा विश्वविद्यालय का पुनरुज्जीवन
                                                         गौरवशाली नालंदा के अवशेष

ईसा की 12वीं शताब्दी के अंत में बर्बर तुर्क आक्रांता बख्तियार खां खिलजी द्वारा ध्वस्त किये गये दुनिया के प्रथम आवासीय विश्वविद्यालय ‘नालंदा विश्वविद्यालय' को पुनरुज्जीवित करने का प्रयत्न हो रहा है। भारत सरकार ने ‘नालंदा अंतर्राष्ट्रीय वि.वि. विधेयक-2010' पारित कर दिया है। चीन ने इसके लिए एक अरब अमेरिकी डॉलर अनुदान देने की घोषणा की है। इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए प्रख्यात अर्थशास्त्री, नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन को ‘अंतरिम गवर्निंग बोर्ड' का अध्यक्ष बनाया गया है। वह इस नवकल्पित विश्वविद्यालय को प्राचीन नालंदा वि.वि. जैसा ही गौरवशाली अंतर्राष्ट्रीय शैक्षिक संस्थान बनाना चाहते हैं। आशा की जानी चाहिए कि यह वि.वि. प्राचीन नालंदा की गौरव गरिमा को और आगे बढ़ाएगा।


ज्ञात इतिहास में दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय-नालंदा विश्वविद्यालय-12वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में तुर्क हमलावर बख्तियार खां खिलजी द्वारा जलाकर राख कर दिया गया था। उसके करीब 10 हजार छात्रों व 2000 अध्यापकों में से अधिकांश मौत के घाट उतार दिये गये थे। विश्वविद्यालय के 9 मंजिले तीन पुस्तकालय भवन (रत्न सागर, रत्नोदधि तथा रत्नरंजक) महीनों धू-धू कर जलते रहे। पुस्तकें जलाकर बख्तियार खां की फौजों का खाना पकता रहा। बचे-खुचे छात्रों व अध्यापकों ने फिर से अध्ययन-अध्यापन शुरू करने का प्रयास किया, लेकिन बख्तियार के सैनिकों ने पहुंचकर उन्हें भी मार डाला। फारसी इतिहासकार मिन्हाज शिरानी ने अपनी पुस्तक ‘तबक्कत नासिरी' में इस ध्वंस का बड़ा मार्मिक व जीवंत वर्णन किया है। उसने लिखा है कि बख्तियार खिलजी तुर्क ने तलवार के बल पर इस्लाम की स्थापना के अपने अभियान में शिक्षा के इस महान केंद्र पर हमला किया। उसने भारी मारकाट व लूट के बाद पूरे विश्वविद्यालय में आग लगा दी, जिससे वहां कुछ भी बचने न पाए। इस तरह सम्राट गुप्तों के शासनकाल में शकादित्य कुमार गुप्त द्वारा 427ई. में स्थापित प्राचीन विश्व का यह महान विश्वविद्यालय 1197 में पूरी तरह धूलिसात हो गया। शताब्दियों तक पूरा क्षेत्र वीरान पड़ा रहा। 20वीं शताब्दी के पुरातात्विक उत्खननों में मिले अवशेषों से इसकी कहानी फिर जीवित हुई। और प्रसन्नता की बात है कि 21वीं शताब्दी में इस ऐतिहासिक स्थल पर नालंदा पुनः जीवित होने जा रहा है- ‘नालंदा अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय' के रूप में। ‘नालंदा यूनिवर्सिटी बिल-2010' भारतीय संसद में पारित हो चुका है, अब आगे का कार्य है इसका निर्माण।

नालंदा के महान विश्वविद्यालय को पुनरुज्जीवित करने की कल्पना तो बहुत दिनों से की जा रही थी, किंतु 2006 में भारत, सिंगापुर, चीन तथा जापान ने मिलकर इस स्वप्न को साकार करने का संकल्प लिया। धीरे-धीरे बात आगे बढ़ी। इसके लिए एक अंतरिम गवर्निंग बोर्ड (इंटरिम गवर्निंग बोर्ड ऑफ नालंदा यूनिवर्सिटी) का गठन किया गया, जिसके अध्यक्ष हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र तथा दर्शन के प्रोफेसर, प्रख्यात अर्थशास्त्री एवं नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन बनाये गये। अभी चेन्नई के निकट कटंकुलाथुर स्थित एस.आर.एम. विश्वविद्यालय में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय साइंस कांग्रेस में बोलते हुए अमर्त्य सेन ने इस विश्वविद्यालय के भूतकालीन स्वरूप और इसके भ्विष्य की संकल्पना पर विधिवत प्रकाश डाला। उन्होंने गर्वपूर्वक बताया कि यह दुनिया का प्रथम अंतर्राष्ट्रीय आवासीय विश्वविद्यालय था। पश्चिम के सारे प्राचीन विश्वविद्यालय इसकी स्थापना के चार-पांच सौ साल बाद कहीं जन्म ले सके। नालंदा एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय था, जहां प्राचीनकाल में चीन का कोई शिक्षार्थी उच्च शिक्षा के लिए चीन से बाहर के किसी विश्वविद्यालय में गया। उन्होंने चीनी इतिहासकारों झुआंग जैंग तथा यो जिंग का हवाला देते हुए बताया कि नालंदा में धर्म-दर्शन के अतिरिक्त जन स्वास्थ्य, मेडिसिन, आर्किटेक्चर, स्कल्पचर (वास्तु शास्त्र एवं मूर्तिशास्त्र), व्याकरण, ज्योतिष, न्याय (तर्क शास्त्र) आदि की शिक्षा दी जाती है। बौद्ध स्रोतों से पता चलता है कि उस समय देश में देश से बाहर भी जो कोई भी विद्या थी उसका अध्ययन-अध्यापन इस विश्वविद्यालय में होता रहा। इसे बाकायदे राजनीतिक संरक्षण व सहायता प्राप्त थी। उस समय धार्मिक भेदभाव जैसी कोई चीज नहीं थी। हिन्दू-बौद्ध-जैन आदि की कोई सामाजिक व राजनीतिक विभाजक रेखाएं नहीं खिंची हुई थीं। कुमार गुप्त के काल से लेकर पाल वंश के शासकों ने समान रूप से इस प्रतिष्ठित शिक्षा केंद्र की सहायता की और संरक्षण किया। इसके प्रबंधन व पठन-पाठन में उनका कोई हस्तक्षेप नहीं था। चीनी, फारसी तथा अन्य इतिहासकारों के वर्णनों के अनुसार यहां चीन, कोरिया, जापान, थाईलैंड, यूनान, फारस तथा तुर्की के भी छात्र उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए आते थे। भारत के तत्कालीन बौद्धिक केंद्रों में नालंदा का स्थान सर्वोच्च था। इसीलिए मुस्लिम हमलावरों की नजर में यह शुरू से खटक रहा था। उन्हें अपने मजहबी व राजनीतिक वर्चस्व कायम करने में ये शिक्षा केंद्र सर्वाधिक बाधक थे। इसीलिए मुस्लिम हमलावरों ने तो चुन-चुनकर ऐसे शिक्षा केंद्रों को ध्वस्त किया। पालों के शासनकाल में बिहार और बंगाल के क्षेत्र में पांच महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय थे, जिन्हें मुस्लिम हमलावरों ने ध्वस्त किया। नालंदा के अलावा विक्रमशिला, सोमपुरा, ओदंतपुरा तथा जग्गदला चार अन्य विश्वविद्यालय व विहार थे। इनमें से विक्रमशिला और ओदंतपुरा बंगलादेश की सीमा में चले गये हैं। ये पांचों विहार व विश्वविद्यालय एक ही केंद्रीय नियंत्रण में चलते थे, किंतु विदेशी आक्रांताओं ने सबको ध्वस्त कर दिया।

खैर, अब 8 शताब्दियों के बाद ही सही, किंतु नालंदा का भाग्य करवट ले रहा है। चीन के भारत स्थित राजदूत झांग यान ने अभी बिहार की अपनी यात्रा के दौरान 20 जनवरी को पटना में घोषणा की कि उनकी सरकार नालंदा विश्वविद्यालय के लिए एक अरब डॉलर (करीब 45 अरब रुपये) का अनुदान देगी। जापान व सिंगापुर भी एक बड़ी रकम इसके लिए घोषित करने वाले हैं। आस्ट्रेलिया की सरकार ने अभी पिछले दिनों हनोई (वियेतनाम) में हुए पूर्व एशियायी देशों में शिखर सम्मेलन में घोषणा की कि नालंदा विश्वविद्याालय में पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण (इकोलॉजी एंड इन्वायरमेंट) के अध्ययन के एक ‘आस्ट्रेलियायी चेयर' की स्थापना करेगा। बिहार के एक अप्रवासी नागरिक केलिफोर्निया स्थित, फिल्म निर्माता रवि वर्मा (मूलतः बिहार के कटिहार जिले के निवासी) पिछले दिनों हॉलीवुड की एक 15 सदस्यीय टीम लेकर नालंदा पहुंचे। वह चीनी यात्री ह्वेनत्सांग की यात्रा पर एक वृत्त चित्र (डाक्यूमेंटरी) बना रहे हैं। इस डाक्यूमेंटरी का शीर्षक है ‘हृदयसूत्रम‘। ‘हृदयसूत्रम‘ बौद्ध संग्रह गंथ ‘महाप्रत्ता पारमिता सूत्र‘ का ही एक अंग है। इस सूत्र गंथ को देखने के बाद ही ह्वेनत्सांग के मन में यह उत्कट आकांक्षा पैदा हुई थी कि वह भारत आकर नालंदा में विस्तृत ज्ञानार्जन करें। ह्वेनत्सांग ने भारत में कुल 17 वर्ष बिताये, जिसमें से 12 वर्ष नालंदा में अध्ययन करते हुए बीते। रवि वर्मा की यह ‘डाक्यूमेंटरी' बिहार को आधुनिक विश्व पटल पर रखने का काम करेगी।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी नालंदा के पुनरुज्जीवन के इस प्रयास से बहुत अधिक उत्साहित हैं। उनका कहना है कि बिहार हमेशा भारत की मुख्य धारा में रहा है। राजनीति, धर्म, दर्शन, कला, उद्योग, व्यापार, टेक्नोलॉजी, कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिसमें प्राचीन काल के भारत में बिहार का अग्रणी स्थान न रहा हो। उनका सपना है कि नवकल्पित नालंदा विश्वविद्यालय बिहार के प्राचीन गौरव और उसके उज्ज्वल व समृद्ध भविष्य को जोड़ने का काम करेगा। नीतीश को उम्मीद है कि 2020 तक नया नालंदा अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय अपना रूपाकार ग्रहण कर लेगा।

नालंदा यह शब्द ही बड़ा अनूठा है, जिसका अर्थ है निरंतर देते रहने वाला, यानी जिसका देना कभी नहीं रुकता (न+अलं+दा)। बौद्ध साहित्य से यह संकेत मिलता है कि यह एक प्राचीन समृद्ध नगर था, जहां बुद्ध और महावीर प्रायः आते-जाते रहते थे। पावापुरी जहां महावीर का निधन हुआ था, वह तो नालंदा में ही है। और उनका जन्म स्थल कुंडलपुर भी इसके निकट ही है। यहां श्रेष्ठि वर्ग की तरफ से सदैव ‘सदाव्रत' (निरंतर अन्नदान) चलता रहता था, यानी दिन रात भोजन दान किया जाता था। शायद इसीलिए इसे ‘नालंदा' नाम मिल गया होगा। व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के कारण ही शायद इस नालंदा शहर में शिक्षा के इस महान केंद्र की स्थापना के बारे में सोचा गया।

नालंदा को बौद्ध विश्वविद्यालय के रूप में जाना जाता है, लेकिन वहां कोई धार्मिक भेदभाव नहीं था। हिन्दू-बौद्ध विभेद अंग्रेज या यूरोपीय इतिहासकारों की देन है। वहां आचार्य मंजुश्रीमित्र के काल में जो विषय पढ़ाये जाते थे, उसमें सभी दर्शन तथा धार्मिक व धर्मनिरपेक्ष (सेकुलर) विषय शामिल थे, यहां तक कि वेद, योगशास्त्र, अध्यात्म आदि के साथ विदेशी दर्शन व साहित्य भी पढ़ाए जाते थे। नालंदा के अंतिम अध्यक्ष शाक्य श्रीभद्र 1204 में तिब्बत चले गये थे। शायद वहां के प्रसिद्ध अनुवादक ट्रोपू लोत्सवा के आमंत्रण पर। वहां उन्होंने मूल सर्वास्तिवादी परंपरा शुरू की। एक अन्य तिब्बती अनुवादक चाग लोत्सावा 1235 में जब नालंदा आए, तो उन्होंने उस लुटे पिटे विश्वविद्यालय को देखा, लेकिन उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उसके निकट एक बाग में नालंदा के एक 90 वर्षीय आचार्य राहुल श्रीभद्र 70 छात्रों की एक कक्षा को पढ़ा रहे थे। इसका अर्थ है कि नालंदा के एक दो या अधिक जो भी शिक्षक बच गये थे, उन्होंने अभी भी हिम्मत नहीं हारी थी। पाल राजवंश भी कमजोर हो गया था, लेकिन अंतिम राजा चगलराज के काल में 1400 ईसवीं तक वे किसी न किसी स्तर पर अध्ययन-अध्यापन की परंपरा जारी रखे थे। लेकिन उसके बाद नालंदा का वह प्रतीकात्मक स्वरूप भी समाप्त हो गया।

आशा की जानी चाहिए कि नालंदा के नाम से उसी स्थल पर स्थापित होने वाला यह विश्वविद्यालय धार्मिक व जातिवादी संघर्ष का अड्डा नहीं बनेगा। आज हिन्दू-बौद्ध, दलित-सवर्ण आदि की ऐसी विभेदक दीवारें खड़ी हो गयी हैं, जिससे देश के प्रायः सारे विश्वविद्यालयों के मानवीय या कला संकाय (जिनके अंतर्गत साहित्य, इतिहास, समाज शास्त्र, दर्शन व कला आदि विषय पढ़ाए जाते हैं) आक्रांत हैं।

आज के कई तथाकथित बौद्ध इतिहासकार बता रहे हैं नालंदा के पुस्तकालयों को खिलजी बख्तियार खां ने नहीं, बल्कि ईर्ष्यालु हिन्दुओं व जैनों ने जला दिया था। विज्ञान व तकनीकी विषयों के अध्ययन-अध्यापन में तो कोई समस्या नहीं है, लेकिन नालंदा के पुनरुज्जीवन की सार्थकता तो उस अध्ययन-अध्यापन में निहित है, जो इतिहास की धार्मिक रुढ़ियों को तोड़कर व्यापक मनुष्यता की स्थापना करने वाली हो। इस विश्वविद्यालय से जुड़े अमर्त्य सेन व डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जैसे विद्वानों से अपेक्षा यही है कि यह विश्वविद्यालय भी महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय जैसा रूप न ले ले।

23/01/2011


1 टिप्पणी:

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

‘ अब 8 शताब्दियों के बाद ही सही, किंतु नालंदा का भाग्य करवट ले रहा है। चीन के भारत स्थित राजदूत झांग यान ने अभी बिहार की अपनी यात्रा के दौरान 20 जनवरी को पटना में घोषणा की कि उनकी सरकार नालंदा विश्वविद्यालय के लिए एक अरब डॉलर (करीब 45 अरब रुपये) का अनुदान देगी। ’

क्या यह देश का दुर्भाग्य नहीं कि हमारे ऐतिहासिक शिक्षा संस्थान के पुनरुत्थान के लिए एक ‘दुश्मन’ देश की सहायता लेना पड रहा है और हमारे पूंजीपतियों, जमाखॊरों और देशद्रोही ‘लुटेरों’ के अरबों करोडों डालर विदेशी बैंको में जमा है????? :(